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हर मर्ज की दवा : स्वामी रामदेव
भारत के सबसे चर्चित लोगों में से एक... स्वामी रामदेव, अन्तर्राष्ट्रीय योग गुरू हैं। गज़ब की ऊर्जा और आत्म-विश्वास लिए, वह एक तेज-तर्रार सन्त हैं। साधारण परिवार में जन्में स्वामी रामदेव, आज विश्व-प्रसिद्ध व्यक्ति हैं। असल में वह मात्र एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचार हैं। ऐसा विचार, जो कभी महात्मा गांधी, सुभाषचन्द्र बोस और चन्द्रशेखर जैसे महापुरूषों ने, स्वतंत्र भारत के लिए देखा था। विचार.. देश को स्वालम्बी, स्वस्थ, मजबूत और विकसित राष्ट्र बनाने का। ताकि हम अपनी महान वैदिक संस्कृति और ज्ञान के बल पर विश्वगुरू बन सके।

स्वामी रामदेव जी का जन्म हरियाणा के महेन्द्रगढ़ जनपद में सैयद अलीपुर गांव में हुआ था। 25 दिसंबर,1965 को श्रीयुत राम निवास यादव के साधारण परिवार में जन्में, इस बालक का नाम रामकृष्ण रखा गया। आंठवी कक्षा के बाद वह पक्षाघात से ग्रसित हो गये। योगासनों के निरंतर अभ्यास व जड़ी- बूटियों से निर्मित औषधियों के अद्भुत प्रभाव से वह जल्द स्वस्थ्य हो गये। आगे की पढ़ाई के लिये माता पिता ने उन्हें खानपुर के गुरुकुल में भेज दिया। जहां स्वामी बल्देवाचार्य जी ने रामकृष्ण को शिक्षा दी। उन्होंने संस्कृत में पाणिनी की अष्टाध्यायी सहित वेद व उपनिषद आदि सभी ग्रन्थ मात्र डेढ़ वर्ष के अल्पकाल में कण्ठस्थ कर लिये। युवास्था में ही सन्यासी हो गये और गुरुओं ने दीक्षा के बाद उन्हें नया नाम दिया आचार्य रामदेव ।

रामदेव जी ने सन् 1995 से योग को लोकप्रिय और सर्वसुलभ बनाने के लिये अथक परिश्रम करना आरम्भ किया। उन्होंने आचार्य करमवीर के साथ मिलकर दिव्य मन्दिर ट्रस्ट की स्थापना की। उन्होंने पतंजलि योगपीठ ट्रस्ट की भी स्थापना की। आज यहां असाध्य रोगों से लड़ने के लिए शोध हो रहे हैं। भारत को पुन: विश्वगुरू स्थापित करने का प्रयास चल रहा है। स्वामी जी सरल विधियां बताकर योगासन और प्राणायम की ख्याति को बढ़ा रहे हैं। योग के माध्यम से वह निराश लोगों के जीवन में बदलाव ला रहे हैं। स्वामी जी योग और प्राणायम के अलावा गौरवमयी भारतीय संस्कृति के प्रचारक भी हैं।

भारतीय संस्कृति और गौरव को चोट पहुंचाने वाले ठेकेदारों को हमेशा उन्होंने धूल चटाई है। पेप्सी-कोला, ऐलोपैथी दवाई कंपनियों और वृन्दा करात जैसे कई लोगों के खिलाफ उनका पोल-खोल कार्यक्रम आज भी जारी है। कुतर्कों की नींव पर जनविरोधी कार्यों को सही ठहराने वाले लोग, अब बाबा से डरने लगे हैं। हर विषय पर चर्चा करने से पहले उसके तथ्य और आंकड़ों की पूरी लिस्ट उनके पास होती है। वह भगतसिंह और राजगुरू की ही तरह क्रांतिकारी हैं और देश की अस्मिता और स्वाभिमान के लिए उतने ही दिवाने। देश के मामले में ....नो इफ नो बट...केवल बाबा का हठ..... हठ भारत को उसका गौरव वापस दिलाने का ... संकल्प इतना मजबूत कि उनके आगे इण्लैंड की रानी को भी झुकना पड़ा।

बाबा की झोली में बीमारी का सरल उपाय है। निरोगी रहना है तो योग करो...इतना ही नहीं, उन्हें तो राष्ट्र को लग रहे, रोगों से भी निपटना है। देश को भ्रष्ट्राचार, तस्करी, नकली नोट की बीमारी खा रही है.... इलाज है ना बाबा के पास ....स्वामी जी कहते हैं कि -देश की अर्थव्यवस्था के लिए खतरा बन रहे कालाधन, भ्रष्टाचार तथा नकली नोटों की तस्करी को रोकने के लिए बड़े नोटों की छपाई तुरंत बंद करके छोटे नोटों की छपाई करनी चाहिए। भ्रष्टाचार के लिए छोटे नोट देना एक समस्या बन सकता है क्योंकि उनका लेन-देन करना बहुत ही कठिन होगा।

अमरनाथ धाम
अमरनाथ हिन्दुओं की आस्था के सबसे बड़े धार्मिक प्रतीकों में से एक है। कश्मीर में श्रीनगर से 135 किलोमीटर दूरी पर स्थित इस स्थान की समुद्रतल से ऊंचाई 13,600 फुट है । यहां पर भगवान शिव की आराधना की जाती है। इसके पीछे कई पौराणिक कथाएं भी है । इन्ही में से एक कथा के अनुसार भगवान शिव ने मां पार्वती को अमरत्व का रहस्य इसी स्थान पर बताया था।

प्रमुख विशेषता
यहां की सबसे प्रमुख विशेषता है बर्फ से प्राकृतिक शिवलिंग का निर्मित होना। प्राकृतिक हिम से निर्मित होने के कारण इसे स्वयंभू हिमानी शिवलिंग भी कहते हैं। आषाढ़ पूर्णिमा के प्रारंभ होते ही यहां भक्तों का आना-जाना प्रारंभ हो जाता है। शिवलिंग का निर्माण एक गुफा में होता है जिसकी परिधि अंदाजन डेढ़ सौ फुट होगी। भीतर का स्थान कामोबेश चालीस फुट में फैला है और इसमें ऊपर से बर्फ के पानी की बूंदे जगह-जगह टपकती रहती हैं। शिवलिंग श्रावण पूर्णिमा को अपने पूरे आकार में आ जाता है। आश्चर्य की बात तो यह होती है कि यह शिवलिंग ठोस वर्फ का निर्मित होता है। जब की पूरी गुफा पर आप नजर डालें तो आपक कच्ची वर्फ ही नजर आती है।

पौराणिक कथा
शिवलिंग के निर्माण को लेकर पौराणिक कथा भी है। कहा जाता है कि माता पार्वती को भगवान शिव ने इसी स्थान पर अमर होने का राज बताया था। जब भगवान शिव मां पार्वती को यह गाथा बता रहे थे तो वहां पर कबूतर के एक जोड़े ने इस गाथा को सुन लिया था यह जोड़ा आज भी श्रद्धालुओं को दिखाई देता है। जिन्हे श्रद्धालु अमर पक्षी कहते है। कुछ विद्वानों का मत है कि भगवान शिव जब मां पार्वती को यह गाथा सुनाने के लिए जा रहे थे तो उन्होंने छोटे-छोटे अनंत नागों को छोड़ दिया था , माथे के चंदन को चंदनबाड़ी में उतारा, अन्य पिस्सुओं को पिस्सू टॉप पर और गले के शेषनाग को शेषनाग नामक स्थल पर छोड़ा था। ये तमाम स्थल आज भी अमरनाथ यात्रा के दौरान आते है। इस गुफा की सर्वप्रथम जानकारी सोलहवीं शताब्दी के पूर्वाध में एक मुसलमान गड़रिए को प्राप्त हुई थी। इसी कारण मंदिर के चढ़ावे का एक चौथाई भाग आज भी मुसलमान गड़रिए के वंशजों को दिया जाता है।

कैसे जाएं
अमरनाथ यात्रा को संपूर्ण करने के दो रास्ते है। एक रास्ता पहलगाम से होकर जाता है और दूसरा रास्ता सोनमर्ग बालटाल से होकर जाता है। पहलगाम और बालटाल तक किसी भी सवारी से पहुंचा जा सकता है। लेकिन यहां से आगे का रास्ता पैदल ही तय करना होता है। पहलगाम से जाने वाले रास्ते को सुविधाजनक माना जाता है। क्योकि बलटाल से जाने वाला रास्ता दुर्गम है और वहां असुरक्षा की संभावना ज्यादा रहती है । इसलिए भारत सरकार द्वारा अधिकतर यात्रियों को पहलगाम के रास्ते ही दर्शन की सुविधा उपलब्ध कराती है। जम्मू से पहलगाम की दूरी 315 किलोमीटर है और सरकार यहां से बस उपलब्ध कराती है। इसी के साथ गैर सरकारी संस्थाए भी यहां अहम भूमिका निभाती है और दर्शन के लिए आए यात्रियों को सुविधा उपलब्ध कराती है। यहीं से यात्रियों की पैदल यात्रा प्रारंभ होती है। पहलगाम से आठ किलो मीटर की दूरी पर पहला पड़ाव चंदनबाड़ी पड़ता है। यहां यात्री विश्राम करते है और फिर दूसरी चढ़ाई यानि पिस्सु घाटी के लिए रवाना हो जाते है। इस स्थान से जुड़ी एक पौराणिक गाथा भी है कि इस घाटी में देवताओं और राक्षसों के बीच घमासान लड़ाई हुई जिसमें राक्षसों की हार हुई। चंदनबाड़ी से 14 किलोमीटर दूर शेषनाग श्रद्धालुओं का दूसरा पड़ाव होता है। यहां पर एक बहुत सुंदर झील है किंवदंतियों के मुताबिक शेषनाग झील में शेषनाग का वास है और चौबीस घंटों के अंदर शेषनाग एक बार झील से बाहर निकलकर लोगों को दर्शन देते है। शेषनाग से पंचतरणी आठ मील के फासले पर है। मार्ग में बैववैल टॉप और महागुणास दर्रे से आगे बढ़ते हुए महागुणास चोटी से पंचतरणी तक का सारा रास्ता उतराई का है। यहां पांच छोटी-छोटी सरिताएं बहती है इसी के कारण इस स्थान का नाम पंचतरणी पड़ा। यहां श्रद्धालुओं को सावधानी बरतनी पड़ती है क्यों कि ऑक्सीजन की कमी इस स्थान पर पाई जाती है। यहां से अमरनाथ की गुफा आठ किलोमीटर दूर रह जाती है लेकिन आगे के रास्ते में वर्फ जमी होने के कारण रास्ता कठिन हो जाता है। इस रास्ते को तय करने के बाद अब भगवान अमरनाथ के दर्शन कर सकते है।

कुंभ मेला
सनातन धर्म व भारतीय संस्कृति का महापर्व कुंभ मेला इस बार 2010 में हरिद्वार में आयोजित हो रहा है। कुंभ दुनिया का सबसे बड़ा आयोजन हैं, जहां एक ही आजोजन में सबसे अधिक लोग हिस्सा लेते हैं। कुंभ पर्व हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसमें करोड़ों श्रद्धालु कुंभ पर्व स्थल- हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक- में स्नान करते हैं। इनमें से प्रत्येक स्थान पर प्रति बारहवें वर्ष इस पर्व का आयोजन होता है। हरिद्वार और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ होता है।

कुंभ पर्व के आयोजन को लेकर दो-तीन पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं जिनमें से सर्वाधिक मान्य कथा देव-दानवों द्वारा समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत कुंभ से अमृत बूँदें गिरने को लेकर है। इस कथा के अनुसार महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण जब इंद्र और अन्य देवता कमजोर हो गए तो दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया। तब सब देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास गए और उन्हे सारा वृतान्त सुनाया। तब भगवान विष्णु ने उन्हे दैत्यों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करके अमृत निकालने की सलाह दी। भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर संपूर्ण देवता दैत्यों के साथ संधि करके अमृत निकालने के यत्न में लग गए। अमृत कुंभ के निकलते ही देवताओं के इशारे से इंद्रपुत्र 'जयंत' अमृत-कलश को लेकर आकाश में उड़ गया। उसके बाद दैत्यगुरु शुक्राचार्य के आदेशानुसार दैत्यों ने अमृत को वापस लेने के लिए जयंत का पीछा किया और घोर परिश्रम के बाद उन्होंने बीच रास्ते में ही जयंत को पकड़ा। तत्पश्चात अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देव-दानवों में बारह दिन तक अविराम युद्ध होता रहा।

इस परस्पर मारकाट के दौरान पृथ्वी के चार स्थानों (प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक) पर कलश से अमृत बूँदें गिरी थीं। उस समय चंद्रमा ने घट से प्रस्रवण होने से, सूर्य ने घट फूटने से, गुरु ने दैत्यों के अपहरण से एवं शनि ने देवेन्द्र के भय से घट की रक्षा की। कलह शांत करने के लिए भगवान ने मोहिनी रूप धारण कर यथाधिकार सबको अमृत बाँटकर पिला दिया। इस प्रकार देव-दानव युद्ध का अंत किया गया।

अमृत प्राप्ति के लिए देव-दानवों में परस्पर बारह दिन तक निरंतर युद्ध हुआ था। देवताओं के बारह दिन मनुष्यों के बारह वर्ष के तुल्य होते हैं। अतएव कुंभ भी बारह होते हैं। उनमें से चार कुंभ पृथ्वी पर होते हैं और शेष आठ कुंभ देवलोक में होते हैं, जिन्हें देवगण ही प्राप्त कर सकते हैं, मनुष्यों की वहाँ पहुँच नहीं है।

जिस समय में चंद्रादिकों ने कलश की रक्षा की थी, उस समय की वर्तमान राशियों पर रक्षा करने वाले चंद्र-सूर्यादिक ग्रह जब आते हैं, उस समय कुंभ का योग होता है अर्थात जिस वर्ष, जिस राशि पर सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति का संयोग होता है, उसी वर्ष, उसी राशि के योग में, जहाँ-जहाँ अमृत बूँद गिरी थी, वहाँ-वहाँ कुंभ पर्व होता है।

सिख धर्म
सिख धर्म पंद्रहवीं शताब्दी में उपजा और सत्रहवीं शताब्दी में धर्म रूप में परिवर्तित हुआ था. यह उत्तर भारत में पंजाब राज्य में जन्मा था। इसके प्रथम गुरु थे गुरु नानक देव जी। गुरू नानक जी का जन्‍म 15 अप्रैल 1469 को पश्चिमी पंजाब के तलवंडी गांव में हुआ था। एक बालक के रूप में उन्‍हें दुनियावी चीज़ों में कोई दिलचस्‍पी नहीं थी। तेरह वर्ष की उम्र में उन्‍हें ज्ञान प्राप्ति हुई। इसके बाद उन्‍होंने देश के लगभग सभी भागों में यात्रा की और मक्‍का तथा बगदाद भी गए और अपना संदेश सभी को दिया।

सिख एक ही ईश्वर को मानते हैं जिसे वे एक-ओंकार कहते हैं, उनका मानना है कि ईश्वर अकाल और निरंकार है । लेकिन ईश्वर तक पहुंचने के लिए वो दस गुरुओं की सहायता को महत्त्वपूर्ण समझते हैं। अधिकांश सिख पंजाब (भारत) में रहते हैं । सिख शब्द संस्कृत शब्द शिष्य से निकला है, जिसका अर्थ है शिष्य या अनुयायी। इस समय सिख धर्म दुनिया का पाँचवां संगठित धर्म भी माना जाता है। दस गुरुओं और श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के हुक्म के अनुसार जीवन यापन करने वाला व्यक्ति सिख कहलाता है। श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने इसे खालसा पंथ में परिवर्तित किया।

स्वर्ण मंदिर
सिक्खों का सबसे बड़ा गुरूद्वारा स्वर्ण मंदिर है,जो कि अमृतसर में है। यह गुरू रामदास का डेरा हुआ करता था। इसका पूरा नाम हरिमंदिर साहिब है । पूरा अमृतसर शहर स्वर्ण मंदिर के चारों तरफ बसा हुआ है। अमृतसर का नाम वास्तव में उस तालाब के नाम पर रखा गया है, जिसका निर्माण गुरू रामदास ने अपने हाथों से कराया था। पूरा स्वर्ण मंदिर सफेद पत्थरों से बना हुआ है और इसकी दिवारों पर सोने की पत्तियों से नक्काशी की गई है।

सिक्‍ख गुरु
गुरू नानकदेव Guru Nanakdev
ननकाना साहिब, गुरुनानक जी की जन्मस्थली है जो अब पाकिस्तान में है। उनका जन्म.. सम्वत 1526 की कार्तिक पूर्णिमा (15 अप्रैल 1469 ई.) को तलवण्डी में हुआ था। पाकिस्तान के लाहौर जिले में स्थित शेखुपुरा का यह क्षेत्र अब ननकाना साहिब के नाम से प्रसिद्ध है। गुरू नानक जी के पिता मेहता कल्याण दास जी थे और उनकी माता का नाम तृप्ता था।

बचपन से इनमें प्रखर बुद्धि के लक्षण दिखाई देने लगे थे। पढ़ने लिखने में इनका मन नहीं लगा। 7-8 साल की उम्र में स्कूल छूट गया और सारा समय वे आध्यात्मिक चिंतन और सत्संग में व्यतीत करने लगे। 16 वर्ष की अवस्था में इनका विवाह हुआ। श्रीचंद और लक्ष्मीचंद ना म के दो पुत्र भी इन्हें हुए। 1507 में ये अपने परिवार का भार अपने श्वसुर पर छोड़कर यात्रा के लिए निकल पड़े। 1521 तक इन्होंने तीन यात्राचक्र पूरे किए, जिनमें भारत, अफगानिस्तान, फारस और अरब के मुख्य मुख्य स्थानों का भ्रमण किया। उन्होंने भाई लहणा जी को 1539 में “द्वितीय नानक” के रूप में गुरुपद प्रदान किया और कुछ दिनों के बाद वह सचखंड में 22 नवम्बर 1539 को ज्योति जोत समा गये। गुरू नानक देव जी एक महान क्रान्तिकारी, समाज सुधारक और राष्ट्रवादी गुरू थे। गुरु नानक अपने व्यक्तित्व में दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्मसुधारक, समाजसुधारक, कवि, देशभक्त और विश्वबंधु - सभी के गुण समेटे हुए थे। नानक सर्वेश्वरवादी थे। मूर्तिपूजा को उन्होंने निरर्थक माना। रूढ़ियों और कुसंस्कारों के विरोध में वे सदैव तीखे रहे। ईश्वर का साक्षात्कार, उनके मतानुसार, बाह्य साधनों से नहीं वरन् आंतरिक साधना से संभव है। उनके दर्शन में वैराग्य तो है ही साथ ही उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक स्थितियों पर भी नजर डाली है। नानक अच्छे कवि भी थे। उनके भावुक और कोमल हृदय ने प्रकृति से एकात्म होकर जो अभिव्यक्ति की है, वह निराली है। उनकी भाषा "बहता नीर" थी जिसमें फारसी, मुल्तानी, पंजाबी, सिंधी, खड़ी बोली, अरबी, संस्कृत, और ब्रजभाषा के शब्द समा गए थे।

गुरू अंगद देव Guru Angad Dev
गुरू अंगद देव महाराज जी का सृजनात्मक व्यक्तित्व था। उनमें ऐसी अध्यात्मिक क्रियाशीलता थी जिससे पहले वे एक सच्चे सिख बनें और फिर एक महान गुरु। गुरू अंगद साहिब जी (भाई लहना जी) का जन्म हरीके नामक गांव में, जो कि फिरोजपुर, पंजाब में आता है, वैसाख वदी 1, (पंचम्‌ वैसाख) सम्वत 1561 (31 मार्च, 1504) को हुआ था। गुरुजी एक व्यापारी श्री फेरू जी के पुत्र थे। उनकी माता जी का नाम माता रामो जी था। बाबा नारायण दास त्रेहन उनके दादा जी थे, जिनका पैतृक निवास मत्ते-दी-सराय, जो मुख्तसर के समीप है, में था। फेरू जी बाद में इसी स्थान पर आकर निवास करने लगे। सनातनी मत की अपनी आध्यात्मिक माता के प्रभाव से भाई लहना जी दुर्गा की पूजा करते थे। वो प्रतिवर्ष भक्तों के एक जत्थे का नेतृत्व कर ज्वालामुखी मंदिर जाया करता था। 1520 में उनका विवाह माता खीवीं जी से हुआ। उनसे उनके दो पुत्र - दासू जी एवं दातू जी तथा दो पुत्रियाँ - अमरो जी एवं अनोखी जी हुई। मुगल एवं बलूच लुटेरों (जो कि बाबर के साथ आये थे) की वजह से फेरू जी को अपना पैतृक गांव छोड़ना पड़ा। इसके पश्चात उनका परिवार तरन तारन के समीप अमृतसर से लगभग 25 कि.मी. दूर स्थित खडूर साहिब नामक गांव में बस गया, जो कि ब्यास नदी के किनारे स्थित था। गुरू अंगद साहिब ने गुरूमुखी लिपि की एक वर्णमाला को भी प्रस्तुत किया। नवयुवकों के लिए उन्होंने मल्ल-अखाड़ा की प्रथा शुरू की। उन्होंने गुरू नानक साहिब जी की जीवनी लिखी और 63 श्लोकों की रचना की, जो कि गुरू ग्रन्थ साहिब जी में अंकित हैं। उन्होने गुरू नानक साहिब जी के विचारों का प्रचार किया और सिख धर्म के आधार को बल दिया।

गुरू अमर दास जी Guru Amardas ji
गुरू अमर दास जी सिख पंथ के एक महान प्रचारक थे। जिन्होंने गुरू नानक जी महाराज के जीवन दर्शन को और उनके द्वारा स्थापित धार्मिक विचाराधारा को आगे बढाया। “तृतीय नानक” गुरू अमर दास जी का जन्म अमृतसर स्थित बसर्के गिलां में वैसाख सुदी 14वीं (8वीं जेठ), सम्वत 1536 को हुआ था। उनके पिता तेज भान भल्ला जी एवं माता बख्त कौर जी एक सनातनी हिन्दू थे और हर वर्ष गंगा जी के दर्शन के लिए हरिद्वार जाया करते थे। गुरू अमर दास जी का विवाह माता मंसा देवी जी से हुआ था। उनकी चार संतानें थी। जिनमें दो पुत्रियां- बीबी दानी जी एवं बीबी भानी जी थी। बीबी भानी जी का विवाह गुरू रामदास साहिब जी से हुआ था। उनके दो पुत्रा- मोहन जी एवं मोहरी जी थे।

एक बार गुरू अमरदास साहिब जी ने बीबी अमरो जी (गुरू अंगद साहिब की पुत्रीी) से गुरू नानक साहिब के शबद सुने। वे इससे इतने प्रभावित हुए कि गुरू अंगद साहिब से मिलने के लिए खडूर साहिब गये। गुरू अंगददेव साहिब जी की शिक्षा के प्रभाव में आकर गुरू अमर दास साहिब ने उन्हें अपना गुरू बना लिया और वो खडूर साहिब में ही रहने लगे। वे नित्य सुबह जल्दी उठकर गुरू अंगद देव जी के स्नान के लिए ब्यास नदी से जल लाते और गुरू के लंगर लिए जंगल से लकड़ियां काट कर लाते।

गुरू अंगद साहिब ने गुरू अमरदास साहिब को “तृतीय नानक” के रूप में मार्च 1552 को स्थापित किया। गुरू अमरदास साहिब जी की भक्ति एवं सेवा गुरू अंगद साहिब जी की शिक्षा का परिणाम था। गुरू साहिब ने अपने कार्यों का केन्द्र एक नए स्थान गोइन्दवाल को बनाया। यही बाद में एक बड़े शहर के रूप में प्रसिद्ध हुआ। यहां उन्होंने संगत की रचना की और बड़े ही सुनियोजित ढंग से सिख विचारधारा का प्रसार किया। उन्होंने यहां सिख संगत को प्रचार के लिए सुसंगठित किया। विचार के प्रसार के लिए २२ धार्मिक केन्द्रों- “मंजियां” की स्थापना की। हर एक केन्द्र या मंजी पर एक प्रचारक प्रभारी को नियुक्त किया। जिसमें एक रहतवान सिख अपने दायित्वों के अनुसार धर्म का प्रचार करता था। गुरु अमरदास जी ने स्वयं एवं सिख प्रचारकों को भारत के विभिन्न भागों में भेजकर सिख पंथ का प्रचार किया।

उन्होंने “गुरू का लंगर” की प्रथा को स्थापित किया और हर श्रद्धालु के लिए “पहले पंगत फिर संगत'' को अनिवार्य बनाया। एक बार अकबर गुरू साहिब को देखने आये तो उन्हें भी मोटे अनाज से बना लंगर छक कर ही फिर गुरू साहिब का साक्षात्कार करने का मौका मिला। गुरु अमरदास जी ने सतीप्रथा का प्रबल विरोध किया। उन्होंने विधवा विवाह को बढ़ावा दिया और महिलाओं को पर्दा प्रथा त्यागने के लिए कहा। उन्होंने जन्म, मृत्यू एवं विवाह उत्सवों के लिए सामाजिक रूप से प्रासांगिक जीवन दर्शन को समाज के समक्ष रखा। इस प्रकार उन्होंने सामाजिक धरातल पर एक राष्ट्रवादी व आध्यात्मिक आन्दोलन को उकेरा। इस विचारधारा के सामने मुस्लिम कट्टपंथियों का जेहादी फलसफा था। उन्हें इन तत्वों से विरोध भी झेलना पड़ा। उन्होंने संगत के लिए तीन प्रकार के सामाजिक व सांस्कृतिक मिलन समारोह की संरचना की। ये तीन समारोह थे-दीवाली, वैसाखी एवं माघी ।

गुरू अमरदास साहिब जी ने गोइन्दवाल साहिब में बाउली का निर्माण किया जिसमें 84 सीढियां थी एवं सिख इतिहास में पहली बार गोइन्दवाल साहिब को सिख श्रद्धालू केन्द्र बनाया। उन्होंने गुरू नानक साहिब एवं गुरू अंगद साहिब जी के शबदों को सुरक्षित रूप में संरक्षित किया। उन्होने 869 शबदों की रचना की। उनकी वाणी में आनन्द साहिब जैसी रचना भी है। गुरू अरजन देव साहिब ने इन सभी शबदों को गुरू ग्रन्थ साहिब में अंकित किया।

गुरू साहिब ने अपने किसी भी पुत्र को सिख गुरू बनने के लिए योग्य नहीं समझा, इसलिए उन्होंने अपने दामाद गुरू रामदास साहिब को गुरुपद प्रदान किया। यह एक प्रयोग धर्मी निर्णय था। बीबी भानी जी एवं गुरू रामदास साहिब में सिख सिद्धान्तों को समझने एवं सेवा की सच्ची श्रद्धा थी और वो इसके पूर्णतः काबिल थे। यह प्रथा यह बताती है कि गुरूपद किसी को भी दिया जा सकता है। गुरू अमरदास साहिब को देहांत 95 वर्ष की आयु में भादों सुदी 14 (पहला आसु) सम्वत 1631 (सितम्बर 1, 1574) को गुरू रामदास साहिब जी को गुरूपद सौंपने के पश्चात गाईन्दवाल साहिब में हुआ था।

गुरू राम दास Guru Ramdas
उन दिनों जब विदेशी आक्रमणकारी एक शहर के बाद दूसरा शहर तबाह कर रहे थे, तब गुरू राम दास जी महाराज ने एक पवित्र शहर रामसर, जो कि अब अमृतसर के नाम से जाना जाता है, का निर्माण किया। गुरू राम दास साहिब जी (जेठा जी) का जन्म चूना मण्डी, लाहौर (अब पाकिस्तान में) में कार्तिक वदी 2, (25वां आसू) सम्वत 1591 (24 सितम्बर, 1534) को हुआ था। माता दया कौर जी (अनूप कौर जी) एवं बाबा हरी दास जी सोढी खत्री का यह पुत्र बहुत ही सुंदर एवं आकर्षक था। राम दास जी का परिवार बहुत गरीब था। उन्हें उबले हुए चने बेच कर उन्हें अपनी रोजी रोटी कमानी पड़ती थी। जब वो मात्र 7 वर्ष के थे, उनके माता पिता की मृत्यु हो गयी। उनकी नानी उन्हें अपने साथ बसर्के गांव ले आयी। उन्होंने बसर्के में 5 वर्षों तक उबले हुए चने बेच कर अपना जीवन यापन किया। एक बार गुरू अमर दास साहिब जी रामदास साहिब जी की नानी के साथ उनके दादा की मृत्यु पर बसर्के आये और उन्हें राम दास साहिब से एक गहरा लगाव सा हो गया। रामदास जी अपनी नानी के साथ गोइन्दवाल आ गये एवं वहीं बस गये। यहां भी वे अपनी रोजी रोटी के लिए उबले चने बेचने लगे एवं साथ ही साथ गुरू अमरदास साहिब जी द्वारा धार्मिक संगतों में भी भाग लेने लगे। उन्होंने गोइन्दवाल साहिब के निर्माण की सेवा की। रामदास साहिब जी का विवाह गुरू अमरदास साहिब जी की पुत्री बीबी भानी जी के साथ हो गया। उनके यहां तीन पुत्रों पृथी चन्द जी, महादेव जी एवं अरजन साहिब जी ने जन्म लिया। शादी के पश्चात रामदास जी गुरु अमरदास जी के पास रहते हुए गुरु घर की सेवा करने लगे। वे गुरू अमरदास साहिब जी के अति प्रिय व विश्वासपात्र सिख थे। वह भारत के विभिन्न भागों में लम्बे धार्मिक प्रवासों के दौरान गुरु अमरदास जी के साथ ही रहते।

गुरु अर्जुन देव Guru Arjun Dev
गुरु अर्जुन देव जी शहीदों के सरताज एवं शान्तिपुंज हैं। आध्यात्मिक जगत में गुरु जी को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। उन्हें ब्रह्मज्ञानी भी कहा जाता है। गुरुग्रंथ साहिब में तीस रागों में गुरु जी की वाणी संकलित है। गणना की दृष्टि से श्री गुरुग्रंथ साहिब में सर्वाधिक वाणी पंचम गुरु की ही है। ग्रंथ साहिब का संपादन गुरु अर्जुन देव जी ने भाई गुरदास की सहायता से 1604 में किया। ग्रंथ साहिब की संपादन कला अद्वितीय है, जिसमें गुरु जी की विद्वत्ता झलकती है। उन्होंने रागों के आधार पर ग्रंथ साहिब में संकलित वाणियों का जो वर्गीकरण किया है, उसकी मिसाल मध्यकालीन धार्मिक ग्रंथों में दुर्लभ है। यह उनकी सूझबूझ का ही प्रमाण है कि ग्रंथ साहिब में 36 महान वाणीकारों की वाणियां बिना किसी भेदभाव के संकलित हुई।

गुरू हरगोबिन्द सिंह Guru HarGovind Singh
साहिब की सिक्ख इतिहास में गुरु अर्जुन देव जी के सुपुत्र गुरु हरगोबिन्द साहिब की दल-भंजन योद्धा कहकर प्रशंसा की गई है। गुरु हरगोबिन्दसाहिब की शिक्षा दीक्षा महान् विद्वान् भाई गुरदास की देख-रेख में हुई। गुरु जी को बराबर बाबा बुड्डाजी का भी आशीर्वाद प्राप्त रहा। छठे गुरु ने सिक्ख धर्म, संस्कृति एवं इसकी आचार-संहिता में अनेक ऐसे परिवर्तनों को अपनी आंखों से देखा। जिनके कारण सिक्खी का महान् बूटा अपनी जड़े मजबूत कर रहा था। विरासत के इस महान पौधे को गुरु हरगोबिन्दसाहिब ने अपनी दिव्य-दृष्टि से सुरक्षा प्रदान की तथा उसे फलने-फूलने का अवसर भी दिया। अपने पिता श्री गुरु अर्जुन देव की शहीदी के आदर्श को उन्होंने न केवल अपने जीवन का उद्देश्य माना, बल्कि उनके द्वारा जो महान कार्य प्रारम्भ किए गए थे, उन्हें सफलता पूर्वक सम्पूर्ण करने के लिए आजीवन अपनी प्रतिबद्धता भी दिखलाई। बदलते हुए हालातों के मुताबिक गुरु हरगोबिन्दसाहिब ने शस्त्र एवं शास्त्र की शिक्षा भी ग्रहण की। वह महान योद्धा भी थे। विभिन्न प्रकार के शस्त्र चलाने का उन्हें अद्भुत अभ्यास था। गुरु हरगोबिन्दसाहिब का चिन्तन भी क्रान्तिकारी था। वह चाहते थे कि सिख कौम शान्ति, भक्ति एवं धर्म के साथ-साथ अत्याचार एवं जुल्म का मुकाबला करने के लिए भी सशक्त बने। वह अध्यात्म चिन्तन को दर्शन की नई भंगिमाओं से जोड़ना चाहते थे। गुरु- गद्दी संभालते ही उन्होंने मीरी एवं पीरी की दो तलवारें ग्रहण की। मीरी और पीरी की दोनों तलवारें उन्हें बाबा बुड्डाजी ने पहनाई। यहीं से सिख इतिहास एक नया मोड लेता है। गुरु हरगोबिन्दसाहिब मीरी-पीरी के संकल्प के साथ सिख-दर्शन की चेतना को नए अध्यात्म दर्शन के साथ जोड़ देते हैं। इस प्रक्रिया में राजनीति और धर्म एक दूसरे के पूरक बने। गुरु जी की प्रेरणा से श्री अकाल तख्त साहिब का भी भव्य अस्तित्व निर्मित हुआ। देश के विभिन्न भागों की संगत ने गुरु जी को भेंट स्वरूप शस्त्र एवं घोडे़ देने प्रारम्भ किए। अकाल तख्त पर कवियों ने गुरु-यश व वीर योद्धाओं की गाथाएं गानी प्रारम्भ की। लोगों में मुगल सल्तनत के प्रति विद्रोह जागृत होने लगा। गुरु हरगोबिन्दसाहिब “नानक राज” स्थापित करने में सफलता की ओर बढ़ने लगे। जहांगीर ने गुरु हरगोबिन्दसाहिब को ग्वालियर के किले में बन्दी बना लिया। इस किले में और भी कई राजा, जो मुगल सल्तनत के विरोधी थे, पहले से ही कारावास भोग रहे थे। गुरु हरगोबिन्दसाहिब लगभग तीन वर्ष ग्वालियर के किले में बन्दी रहे। महान सूफी फकीर मीयांमीर गुरु घर के श्रद्धालु थे। जहांगीर की पत्‍‌नी नूरजहां मीयांमीर की सेविका थी। इन लोगों ने भी जहांगीर को गुरु जी की महानता और प्रतिभा से परिचित करवाया। बाबा बुड्डा व भाई गुरदास ने भी गुरु साहिब को बन्दी बनाने का विरोध किया। जहांगीर ने केवल गुरु जी को ही ग्वालियर के किले से आजाद नहीं किया, बल्कि उन्हें यह स्वतन्त्रता भी दी कि वे 52 राजाओं को भी अपने साथ लेकर जा सकते हैं। इसीलिए सिख इतिहास में गुरु जी को “बन्दी छोड़ दाता” कहा जाता है। ग्वालियर में इस घटना का साक्षी गुरुद्वारा “बन्दी छोड़” है। अपने जीवन मूल्यों पर दृढ रहते गुरु जी ने शाहजहां के साथ चार बार टक्कर ली। वे युद्ध के दौरान सदैव शान्त, अभय एवं अडोल रहते थे। उनके पास इतनी बडी़ सैन्य शक्ति थी कि मुगल सिपाही भयभीत रहते थे। गुरु जी ने मुगल सेना को कई बार कडी़ पराजय दी। गुरु हरगोबिन्दसाहिब ने अपने व्यक्तित्व और कृत्तित्व से एक ऐसी अदम्य लहर पैदा की, जिसने आगे चलकर सिख संगत में भक्ति और शक्ति की नई चेतना पैदा की। गुरु जी ने अपनी सूझ-बूझ से गुरुघर के श्रद्धालुओं को सुगठित भी किया और सिख-समाज को नई दिशा भी प्रदान की। अकाल तख्त साहिब, सिख समाज के लिए ऐसी सर्वोच्च संस्था के रूप में उभरा, जिसने भविष्य में सिख शक्ति को केन्द्रित किया तथा उसे अलग सामाजिक और ऐतिहासिक पहचान प्रदान की। इसका श्रेय गुरु हरगोबिन्दसाहिब को ही जाता है।

गुरू हर राय Guru Har Rai
गुरू हरराय जी एक महान आध्यात्मिक व राष्ट्रवादी महापुरुष थे। वे एक महान योद्धा थे। उनका जन्म 1630 ईस्वी में कीरतपुर, रोपड़ में हुआ था। गुरू हरगोविन्द साहिब जी के ज्योति जोत समाने से पहले, अपने पोते हरराय जी को 14 वर्ष की छोटी आयु में 3 मार्च 1644 को “सप्तम्‌ नानक” के रूप में स्थापित किया। गुरू हरराय साहिब जी बाबा गुरदित्ता जी एवं माता निहाल कौर जी के पुत्र थे। गुरू हरराय साहिब जी का विवाह माता किशन कौर जी, जो कि अनूप शहर (बुलन्दशहर), उत्तर प्रदेश के श्री दया राम जी की पुत्री से हुआ। गुरू हरराय साहिब जी के दो पुत्र- 1. श्री रामराय जी, 2. श्री हरकिशन साहिब जी (गुरू) थे। गुरू हरराय साहिब जी का शांत व्यक्तित्व लोगों को प्रभावित करता था। गुरु हरराय साहिब जी ने अपने दादा गुरू हरगोविन्द साहिब जी के सिख योद्धाओं के दल को पुनर्गठित किया। उन्होंने सिख योद्धाओं में नवीन प्राण संचारित किए। वे एक आध्यात्मिक पुरुष होने के साथ-साथ एक राजनीतिज्ञ भी थे। अपने राष्ट्र केन्द्रित विचारों के कारण मुगल औरंगजेब को परेशानी हो रही थी। औरंगजेब का आरोप था कि गुरू हरराय साहिब जी ने दारा शिकोह (शाहजहां के सबसे बड़े पुत्र) की सहायता की है। दारा शिकोह संस्कृत भाषा के विद्वान थे और भारतीय जीवन दर्शन उन्हें प्रभावित करने लगा था। उनकी मृत्‍यु 1661 में हुई और उनके बाद उनके द्वितीय पुत्र हर किशन ने गुरू का पद संभाला।

गुरू हर किशन साहिब Guru Harkisan Sahib
गुरू हर किशन साहिब जी का जन्म सावन वदी 10 (8वां सावन) विक्रम सम्वत 1713 (7 जुलाई 1656) को कीरतपुर साहिब में हुआ। वे गुरू हर राय साहिब जी एवं माता किशन कौर के दूसरे पुत्र थे। राम राय जी गुरू हरकिशन साहिब जी के बड़े भाई थे। रामराय जी को उनके गुरू घर विरोधी क्रियाकलापों एवं मुगल सल्तनत के पक्ष में खड़े होने की वजह से सिख पंथ से निष्कासित कर दिया गया था। 8 वर्ष की अल्प आयु में गुरू हर किशन साहिब जी को गुरुपद प्रदान किया गया। गुरु हर राय जी ने 1661 में गुरु हरकिशन जी अष्ठम्‌ नानक गुरू के रूप में स्थापित हुए। उन्‍होंने अपना जीवन दिल्‍ली के माहमारी से पीड़ित लोगों की सेवा और सुश्रुसा में लगाया। जिस स्‍थान पर उन्‍होंने अपने जीवन की अंतिम सांस ली उसे दिल्‍ली में गुरूद्वारा बंगला साहिब कहा जाता है।

गुरू तेग बहादुर सिंह GuruTeg Bahadur
श्री गुरू तेग बहादुर 1664 में गुरू बने। विश्व इतिहास में धर्म एवं मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धांत की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वालों में गुरु तेग बहादुर साहब का स्थान अद्वितीय है।
"धरम हेत साका जिनि कीआ सीस दीआ पर सिरड न दीआ।" "धरम हेत साका जिनि कीआ सीस दीआ पर सिरड न दीआ।"

इस महावाक्य अनुसार गुरुजी का बलिदान न केवल धर्म पालन के लिए नहीं अपितु समस्त मानवीय सांस्कृतिक विरासत की खातिर बलिदान था। धर्म उनके लिए सांस्कृतिक मूल्यों और जीवन विधान का नाम था। इसलिए धर्म के सत्य शाश्वत मूल्यों के लिए उनका बलि चढ़ जाना वस्तुतः सांस्कृतिक विरासत और इच्छित जीवन विधान के पक्ष में एक परम साहसिक अभियान था। आततायी शासक की धर्म विरोधी और वैचारिक स्वतंत्रता का दमन करने वाली नीतियों के विरुद्ध गुरु तेग बहादुरजी का बलिदान एक अभूतपूर्व ऐतिहासिक घटना थी।

जब कश्‍मीर के मुगल राज्‍यपाल ने हिन्दुओं को बल पूर्वक धर्म परिवर्तन कराने के लिए दबाव डाला तब गुरू तेग बहादुर ने इसके प्रति संघर्ष करने का निर्णय लिया। उन्होंने औरंगजेब को कड़ी चुनौती दी और इस्लाम स्वीकार करने से साफ मना कर दिया। उनका मानना था कि जबरन धर्म परिवर्तन कराने की आजादी कोई धर्म नहीं देता। अपमानित औरंगजेब ने गुस्से में आकर गुरु साहिब के शीश को काटने का हुक्म दे दिया, उन्होंने दिल्ली के चाँदनी चौक पर हँसते-हँसते अपना शीश कटाकर बलिदान दे दिया। गुरूद्वारा रकाबगंज में उनका अंतिम संस्‍कार किया गया। उनकी शहीदी स्थल पर एक गुरुद्वारा बनाया गया, जिसका नाम गुरुद्वारा शीश गंज साहिब है। गुरू श्री हिन्दुस्तान और हिन्दू धर्म की रक्षा करते हुए शहीद हुए, गुरु तेगबहादुरजी को प्रेम से हिन्द की चादर कहा जाता है। गुरुजी महान शहादत देने वाले एक क्रांतिकारी युग पुरुष थे।

गुरु गोबिन्द सिंह Guru Govind Singh
गुरु गोबिन्द सिंह का जन्म बिहार के पटना में 22 दिसम्बर 1666 में हुआ। वह सिखों के दसवें एवं अन्तिम गुरु थे। उनके पिता गुरू तेग बहादुर की मृत्यु के उपरान्त 11 नवम्बर सन 1675 को वे गुरू बने। वह एक महान योद्धा, कवि एवं आध्यात्मिक नेता थे। उन्होंने सन 1699 में बैसाखी के दिन खालसा पन्थ की स्थापना की जो सिखों के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है। उन्होंने मुगलों या उनके सहयोगियों ( जैसे, शिवालिक पहाडियों के राजा) के साथ 14 युद्ध लड़े। गुरू गोबिन्द सिंह ने सिखों की पवित्र ग्रन्थ गुरु ग्रंथ साहिब को पूरा किया और इसे ही सिखों को शाश्वत गुरू घोषित किया। बिचित्र नाटक को उनकी आत्मकथा माना जाता है। यही उनके जीवन के विषय में जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। यह दसम ग्रन्थ का एक भाग है। दसम ग्रन्थ, गुरू गोबिन्द सिंह की कृतियों के संकलन का नाम है। गुरु गोबिंद सिंह का स्वर्गवास 7 अक्टूबर 1708 को हुआ।

गुरु ग्रंथ साहिब
गुरु ग्रंथ साहिब सिख धर्म का प्रमुख धर्मग्रन्थ है। इसका संपादन सिख धर्म के पांचवें गुरु श्री गुरु अर्जुन देव जी ने किया। गुरु ग्रन्थ साहिब जी का पहला प्रकाश 16 अगस्त 1604 को हरिमंदिर साहिब अमृतसर में हुआ। 1705 में दमदमा साहिब में दशमेश पिता गुरु गोविंद सिंह जी ने गुरु तेगबहादुर जी के 116 शब्द जोड़कर इसको पूर्ण किया, इसमे कुल 1430 पृष्ठ है।

गुरुग्रन्थ साहिब में मात्र सिख गुरुओं के ही उपदेश नहीं है, वरन् 30 अन्य हिन्दू और मुस्लिम भक्तों की वाणी भी सम्मिलित है। इसमे जहां जयदेवजी और परमानंदजी जैसे ब्राह्मण भक्तों की वाणी है, वहीं जाति-पांति के आत्महंता भेदभाव से ग्रस्त तत्कालीन समाज में हेय समझे जाने वाली जातियों के प्रतिनिधि दिव्य आत्माओं जैसे कबीर, रविदास, नामदेव, सैण जी, सघना जी, छीवाजी, धन्ना की वाणी भी सम्मिलित है। पांचों वक्त नमाज पढ़ने में विश्वास रखने वाले शेख फरीद के श्लोक भी गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज हैं। अपनी भाषायी अभिव्यक्ति, दार्शनिकता, संदेश की दृष्टि से गुरु ग्रन्थ साहिब अद्वितीय है। इसकी भाषा की सरलता, सुबोधता, सटीकता जहां जनमानस को आकर्षित करती है। वहीं संगीत के सुरों व 31 रागों के प्रयोग ने आत्मविषयक गूढ़ आध्यात्मिक उपदेशों को भी मधुर व सारग्राही बना दिया है।

गुरु ग्रन्थ साहिब में उल्लेखित दार्शनिकता कर्मवाद को मान्यता देती है। गुरुवाणी के अनुसार व्यक्ति अपने कर्मो के अनुसार ही महत्व पाता है। समाज की मुख्य धारा से कटकर संन्यास में ईश्वर प्राप्ति का साधन ढूंढ रहे साधकों को गुरुग्रन्थ साहिब सबक देता है। हालांकि गुरु ग्रन्थ साहिब में आत्मनिरीक्षण, ध्यान का महत्व स्वीकारा गया है, मगर साधना के नाम पर परित्याग, अकर्मण्यता, निश्चेष्टता का गुरुवाणी विरोध करती है। गुरुवाणी के अनुसार ईश्वर को प्राप्त करने के लिए सामाजिक उत्तरदायित्व से विमुख होकर जंगलों में भटकने की आवश्यकता नहीं है। ईश्वर हमारे हृदय में ही है, उसे अपने आन्तरिक हृदय में ही खोजने व अनुभव करने की आवश्यकता है। गुरुवाणी ब्रह्मज्ञान से उपजी आत्मिक शक्ति को लोककल्याण के लिए प्रयोग करने की प्रेरणा देती है। मधुर व्यवहार और विनम्र शब्दों के प्रयोग द्वारा हर हृदय को जीतने की सीख दी गई है।

साँचा:सिख गुरु

रुद्राक्ष:- यानि लाभ ही लाभ
रुद्राक्ष एक फल की गुठली है। इसका उपयोग आध्यात्मिक क्षेत्र में किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शंकर की आँखों के जलबिंदु से हुई है। इसे धारण करने से सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। रुद्राक्ष शिव का वरदान है, जो संसार के भौतिक दु:खों को दूर करने के लिए प्रभु शंकर ने प्रकट किया है।

ईश्वर का वरदान है रूद्राक्ष
वनस्पति जगत में रूद्राक्ष ही एक मात्र ऐसा फल है, जो अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष प्रदान करने में प्रभावपूर्ण होता है। शिवपुराण, पद्मपुराण, रूद्राक्षकल्प, रूद्राक्ष महात्म्य आदि ग्रंथों में रूद्राक्ष की अपार महिमा वर्णित है। रूद्राक्ष योग, भोग व मोक्ष के क्षेत्र में महत्वपूर्ण माने गये हैं। प्रत्येक रूद्राक्ष के ऊपर धारियाँ बनी रहती हैं, इन धारियों को ही रूद्राक्ष का मुख कहते हैं। उक्त धारियों की संख्या 1 से लेकर 21 तक हो सकती है, इन्हीं धारियों को गिनकर रूद्राक्ष का वर्गीकरण 1 से 21 मुखी तक किया जाता है। जिस रूद्राक्ष में जितनी धारियां होंगी, वह उतना ही मुखी रूद्राक्ष माना जाता है।

धार्मिक आधार
रूद्राक्ष पहनने का सौभाग्य का सुख बड़े पुण्य से प्राप्त होता है, क्योंकि यह भगवान शिव का प्रतीक है। धार्मिक मान्यता है कि जिस घर में रूद्राक्ष की प्रतिदिन पूजा की जाती है, वहां अन्न, वस्त्र, धन-धान्य आदि किसी वस्तु की कमी नहीं रहती है। उस घर में लक्ष्मी का अटूट वास रहता है। रूद्राक्ष की प्रतिदिन पूजा करने वाला और इसे धारण करने वाला जीवन के अंतिम दिनों में शिव लोक प्राप्त करता है। कहा जाता है कि सती की मृत्यु पर शिव जी को बहुत दु:ख हुआ और उनके आंसू अनेक स्थानों पर गिरे जिससे रूद्राक्ष (रूद्र+अक्ष अर्थात् शिव के आंसू) की उत्पत्ति हुई। इसीलिए जो व्यक्ति रूद्राक्ष धारण करता है उसे सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है। प्राय: लोगों में बीमारियों का जन्म ग्रहों की प्रतिकूलता के कारण होता है। रूद्राक्ष जहां ग्रहों का शमन करता है वहीं औषधि के रूप में भी रोगों से छुटकारा दिलाता है। किसी भी प्रकार की मानसिक चिंता, रोग एवं शनि के द्वारा पीड़ित चन्द्रमा अर्थात् साढ़े साती से मुक्ति में रूद्राक्ष धारण करने से बिल्कुल दूर हो जाता है। शिव सर्पों को गले में माला बनाकर धारण करते हैं। अत: कालसर्प जनित कष्टों के निवारण में भी रूद्राक्ष विशेष उपयोगी होता है। रूद्राक्ष सिर पर धारण करके जो मनुष्य सिर से स्नान करता है उसे गंगा स्नान का फल प्राप्त होता है।
''रूद्राक्ष मस्तकै धृत्वा शिर: स्नानं करोति य:।
गंगा स्नान फलं तस्य जायते नात्र संशय:॥ ’’
बिना मंत्र के धारण करने से दोष लगता है। सामान्य रूप से ''ऊँ नम: शिवाय ’ ’ से भी रूद्राक्ष धारण किया जा सकता है। रूद्राक्ष धारण करने से बड़े-बड़े संकटों का भी हल आसानी से हो जाता है। परंतु इस विषय में ठोस श्रद्घा एवं विश्वास आवश्यक है। रूद्राक्ष धारण करने वाले को कोई भी व्यक्ति सम्मोहित नहीं कर सकता। भूत-प्रेत आदि के भय से भी छुटकारा मिलता है। रूद्राक्ष पहनने वाले व्यक्ति की अकाल मृत्यु (दुर्घटना आदि में) नहीं होती, ऐसा शास्त्रों का मत है। विशेष:- रूद्राक्ष हर राशि के स्त्री, पुरूष एवं बच्चे धारण कर सकते हैं। परंतु इनको प्राण-प्रतिष्ठिïत करना आवश्यक है तथा धारण करते समय ''ऊँ नम: शिवाय ’ ’ मंत्र का जाप अवश्य कहना चाहिए।

रुद्राक्ष के नाम और उनका स्वरूप
एकमुखी रुद्राक्ष भगवान शिव, द्विमुखी श्री गौरी-शंकर, त्रिमुखी तेजोमय अग्नि, चतुर्थमुखी श्री पंचदेव, षष्ठमुखी भगवान कार्तिकेय, सप्तमुखी प्रभु अनंत, अष्टमुखी भगवान श्री गेणश, नवममुखी भगवती देवी दुर्गा, दसमुखी श्री हरि विष्णु, तेरहमुखी श्री इंद्र तथा चौदहमुखी स्वयं हनुमानजी का रूप माना जाता है। इसके अलावा श्री गणेश व गौरी-शंकर नाम के रुद्राक्ष भी होते हैं।

- एकमुखी रुद्राक्ष - ऐसा रुद्राक्ष जिसमें एक ही आँख अथवा बिंदी हो। स्वयं शिव का स्वरूप है जो सभी प्रकार के सुख, मोक्ष और उन्नति प्रदान करता है।
- द्विमुखी रुद्राक्ष - सभी प्रकार की कामनाओं को पूरा करने वाला तथा दांपत्य जीवन में सुख, शांति व तेज प्रदान करता है।
- त्रिमुखी रुद्राक्ष - ऐश्वर्य प्रदान करने वाला होता है।
- चतुर्थमुखी रुद्राक्ष - धर्म, अर्थ काम एवं मोक्ष प्रदान करने वाला होता है।
- पंचमुखी रुद्राक्ष - सुख प्रदान करने वाला।
- षष्ठमुखी रुद्राक्ष - पापों से मुक्ति एवं संतान देने वाला होता होता है।
- सप्तमुखी रुद्राक्ष - दरिद्रता को दूर करने वाला होता है।
- अष्टमुखी रुद्राक्ष - आयु एवं सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करने वाला होता है।
- नवममुखी रुद्राक्ष - मृत्यु के डर से मुक्त करने वाला होता है।
- दसमुखी रुद्राक्ष - शांति एवं सौंदर्य प्रदान करने वाला होता है।
- ग्यारह मुखी रुद्राक्ष - विजय दिलाने वाला, ज्ञान एवं भक्ति प्रदान करने वाला होता है।
- बारह मुखी रुद्राक्ष - धन प्राप्ति कराता है।
- तेरह मुखी रुद्राक्ष - शुभ व लाभ प्रदान कराने वाला होता है।
- चौदह मुखी रुद्राक्ष - संपूर्ण पापों को नष्ट करने वाला होता है।

ज्योतिषाचार्य आशुतोष वाष्णेय
निदेशक, ग्रह नक्षत्रम् ज्योतिष शोध संस्थान, इलाहाबाद

न्याय के देवता- सूर्यपुत्र शनिदेव
पुराण कहते हैं कि शनि को परमशक्ति परमपिता परमात्मा ने तीनों लोक का न्यायाधीश नियुक्त किया है। शनिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश को भी उनके किए की सजा देते हैं और ब्रह्मांड में स्थित तमाम अन्यों को भी शनि के कोप का शिकार होना पड़ता है।

पुराण कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति के साथ किसी भी प्रकार का अन्याय करता है तो वह शनि की वक्र दृष्टि से बच नहीं सकता। शराब पीने वाले, माँस खाने वाले, ब्याज लेने वाले, परस्त्री के साथ व्यभिचार करने वाले और ताकत के बल पर किसी के साथ अन्याय करने वाले का शनिदेव 100 जन्मों तक पीछा करते हैं।

सूर्य से उक्त ग्रह की उत्पत्ति मानी जाती है, इसीलिए शनि को सूर्य का पुत्र भी माना जाता है। यदि हम ग्रह की बात करें तो शनि ग्रह के चारों ओर जो वलय है वह दूर से नीला नजर आता है। वैज्ञानिक इस वलय को लेकर अभी भी अचंभित हैं कि आखिर ये वलय किसके बने हैं।

देवता या ग्रह : यह विवाद का विषय हो सकता है कि शनि एक देवता हैं या एक ग्रह। हनुमानजी के काल में शनि नाम के एक व्यक्ति भी हुए हैं जिनके चरित्र के आधार पर ही शनिग्रह के चरित्र को माना जाता है। उसी तरह जिस तरह हनुमानजी को मंगलग्रह का देवता नियुक्त किया गया है। फिर भी यह पूरी तरह से शोध का विषय है कि ग्रह और ग्रहों से संबंधित देवताओं का ग्रहों से क्या संबंध है। जो भी हो हिंदुओं के लिए दोनों ही पूजनीय हैं।

पुराणों के अनुसार : इनके सिर पर स्वर्ण मुकुट, गले में माला तथा शरीर पर नीले रंग के वस्त्र और इंद्रनीलमणि के समान। यह गिद्ध पर सवार रहते हैं। इनके हाथों में धनुष, बाण, त्रिशूल रहते हैं। शनि को सूर्य का पुत्र माना जाता है। उनकी बहन का नाम देवी यमुना और माता का नाम छाया (सवर्णा) है।

ज्योतिष अनुसार : ज्योतिषियों अनुसार शनि मकर और कुम्भ राशि के स्वामी हैं तथा इनकी महादशा 19 वर्ष की होती है। यह धरती और शरीर में जहाँ भी तेल और लौह तत्व है उस पर राज करते हैं। शरीर में दाँत, बाल और हड्डियों की मजबूत या कमजोरी का कारण यही हैं।

शनिदेव से सभी डरते हैं क्योंकि ज्योतिष अनुसार शनि की साढ़ेसाती और ढय्या के फेर में फँसे व्यक्ति की जिंदगी में तूफान खड़े हो जाते हैं।

खगोल विज्ञान अनुसार : खगोल विज्ञान के अनुसार शनि का व्यास 120500 किमी, 10 किमी प्रति सेकंड की औसत गति से यह सूर्य से औसतन डेढ़ अरब किमी की दूरी पर रहकर यह ग्रह 29 वर्षों में सूर्य का चक्कर पूरा करता है। गुरु शक्ति पृथ्‍वी से 95 गुना अधिक और आकार में बृहस्पति के बाद इसी का नंबर आता है। अपनी धुरी पर घूमने में यह ग्रह नौ घंटे लगाता है। शनि धरातल का तापमान 240 फेरनहाइट है। शनि के चारों ओर सात वलय हैं, शनि के 15 चन्द्रमा हैं जिनका प्रत्येक का व्यास पृथ्वी से काफी अधिक है।

शनि के प्रसिद्ध मंदिर : महाराष्ट्र का शिंगणापुर गाँव का शनि मंदिर। मध्यप्रदेश के पास शनिश्चरा मंदिर। उत्तरप्रदेश के कोशी के पास कौकिला वन में सिद्ध शनि देव का मंदिर।

बेटा चाहिए, हाई कैलोरी खाईए
विज्ञान पत्रिका "बायोलोजिकल साइंसेज" की एक रिपोर्ट के अनुसार आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और एक्सेटर यूनिवर्सिटी के अनुसंधानकर्ताओं की एक टीम ने पाया कि गर्भधारण के समय महिलाओं के भोजन से उसके शिशुओं का लिंग प्रभावित हो सकता है। वैज्ञानिकों ने इस क्रम में पुत्र रत्न के लिए लालायित महिलाओं को गर्भधारण के काल में नाश्ते में ढेर सारे अनाज और केले का सेवन करने की सलाह दी है। उनकी यह भी सलाह है कि ऎसी महिलाओं को अच्छी खासी मात्रा में नमक का सेवन करना चाहिए। साथ ही उन्हें समग्र दैनिक भोजन में 400 कैलोरी का इजाफा करना चाहिए। यह एक वक्त के खाने के बराबर है।

प्रमुख अनुसंधानकर्ता फायोना मैथ्यूस ने कहा- हमारे पास प्राकृतिक तंत्र का साक्ष्य है जिसके अनुसार महिला अपने भोजन के माध्यम से अपने शिशु के लिंग को पहले से ही नियंत्रित करती प्रतीत होती है। इस अध्ययन के क्रम ब्रिटेन में पहली बार गर्भधारण करने वाली 740 महिलाओं पर ध्यान केंद्रित किया गया है। इन महिलाओं से कहा गया था कि वह गर्भधारण की प्राथमिक अवस्था में अपने खान-पान के बारे में सूचनाएं दें। अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि गर्भधारण के लगभग के काल में उच्चतम कैलोरी वाले भोजन का सेवन करने वाली 56 प्रतिशत महिलाएं बेटे की मां बनीं। इसके मुकाबले कम ऊर्जा वाला भोजन ग्रहण करने वाली महिलाओं में से केवल 45 प्रतिशत को ही बेटा पैदा हुआ।

सनातन धर्म में है ग्लोबल वार्मिंग का समाधान
भारत ही धर्म और आस्था का देश है, लेकिन ऐसा नहीं कि हमारा धर्म हमें अंधविश्वास सिखाता हो या हमारी आस्थाओं के पीछे कोई तर्क ना हो। हम आध्यात्मिक हैं और इस आध्यात्म की जड़ों में भी विज्ञान और गहरी सामाजिक समझ है। आज विश्व को जब ग्लोबल वार्मिंग का दैत्य नज़र आ रहा है है, पर्यावरण-रक्षा ही एक मात्र विकल्प समझ आ रहा है तो हम भारतवासियों को गर्व होना चाहिए अपनी सनातनी संस्कृति और उसकी पौराणिक वैज्ञानिक परम्पराओं पर। हमने पर्यावरण का सम्मान करना किसी पृथ्वी के नष्ट होने डर से नहीं सिखा बल्कि युगों से हम पर्यावरण के प्रति आदर का भाव रखते आयें। हमारी संस्कृति ने पर्यावरण को ना केवल मित्र समझा बल्कि आवश्यकता पड़ने पर ईश्वर का दर्जा भी दिया। पेड़ों की पूजा करना हमारे देश में बचपन में सिखा दिया जाता है। नदियों को हम मां मानते हैं, उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। पीपल, बरगद, तुलसी जैसे ना जाने कितने पेड़ों की हम उपासना करते हैं। तुलसी के पौधे को ही लें। लगभग हर भारतीय घर में, आँगन में आपको तुलसी का बिरवा मिल जाएगा। तुलसी को मां समान मानते हैं। माना जाता है कि इसमें देवताओं का वास है, जिसके पत्ते वेदस्वरूप हैं। क्या कारण है कि तुलसी के प्रति इतना श्रद्धा भाव रखने का? कारण यह है कि तुलसी का बिरवा हमारे शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्‍य के लिए अनिवार्य है।

आज हम अपने आध्यात्म की शक्ति और धर्म के मूल स्वरुप व उसके महत्व को भूल गये हैं। हम अपने ही संस्कृति पर चोट मारने पर गर्व महसूस कर रहे हैं। यह देखकर विदेशी भी खुश हैं। और हो भी क्यों न? वो तो आये ही हमें बर्बाद और लूटने के लिए। वो हमें जितना लूट सकते थे, लूट ले गये। और बर्बाद करने के लिए डाल गये हमारे दिमाग में गंदगी। ऐसी गंदगी जिस पर हमने आंख मूंदकर विश्वास कर लिया। उन्होंने गौ-मूत्र और गोबर को शिट् कहा, हमने भी उनके साथ सुर मिला दिये। आज उन्हीं के विज्ञानिक गौ-मूत्र और गोबर के वैज्ञानिक गुणों के आगे नतमस्तक हैं। असल बात यह है कि भारतीय दर्शन ही विश्व की रक्षा कर सकता है। पर्यावरण की रक्षा, वृक्षों का सम्मान, नदियों की गंगा मां मानकर पूजा करना, जीव-जन्तुओं को ईश्वर के साथ जोड़कर उनकी हत्या करने से बचना, गौ हत्या को महापाप मानना और जो भी हमें जीवन और संरक्षण दे उसको देवतुल्य मानना (पवन, अग्नि, जल, भूमि, देश आदि), ये केवल हमारी महान संस्कृति में ही है। स्वामी विवेकानंदजी का दृढ़ विश्वास था कि अध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जाएगा और ऐसा हो भी रहा है। आज पूरे विश्व को भारतीय दर्शन के उपहास करने की सजा मिल रही है।

अभी भी समय बाकी है कि हम सुधर जायें। अपनी महान संस्कृति और सभ्यता का आदर करें और उस पर गर्व महसूस करना शुरु करें। तभी विश्व का कल्याण होगा और ग्लोबल वार्मिंग से हम लड़ पायेंगे।

12 वर्ष से पहले ही पड़ेगा अगला हरिद्वार कुंभ
कुंभ मेला हर बारह साल बाद आता है। हरिद्वार में 1998 में कुंभ मेला पड़ने के बाद इस बार यहां पर यह महापर्व वर्ष 2010 में आया। इस गणित के हिसाब से अगला कुंभ मेला 2022 में पड़ना चाहिए। लेकिन काल गणना के अनुसार हरिद्वार में अगला कुंभ वर्ष 2021 में ही पड़ जाएगा। इसमें चौंकने वाली कोई बात नहीं है क्योंकि विद्वानों के अनुसार प्रत्येक शताब्दी में एक बार ऐसी घटना अवश्य होती है।

देवभूमि हरिद्वार में कुंभ का योग देवताओं के गुरु, बृहस्पति के कुंभ राशि में तथा सूर्य के मेष राशि में संक्रमण पर पड़ता है। सामान्यत: माना जाता है कि बृहस्पति एक राशि में एक वर्ष रहते हैं और 12 साल में घूम कर फिर उसी राशि में पहुंच जाते हैं। असल में बृहस्पति 4332.5 यानि 11 साल 11 महीने व 27 दिनों में बारह राशियों की परिक्रमा पूरी करते हैं। इस तरह बारह वर्षों में 50.5 दिन कम हो जाते हैं। यह कमी बढ़ते-बढ़ते सातवें-आठवें कुंभ के बीच पूरे एक वर्ष के लगभग हो जाती है। यही वजह है कि आठवां कुंभ 12 साल की जगह 11 साल के अंतराल पर ही पड़ जाता है। 1855 में कुंभ पड़ा और उसके बाद सातवां कुंभ वर्ष 1927 में पड़ा। गुरु की गति के कारण उससे अगला कुंभ 1939 के बजाए 1938 में पड़ गया। यह कुंभ 11 साल बाद पड़ा था। इसी तरह इस शताब्दी का सातवां कुंभ 2010 में पड़ रहा है। लेकिन आठवां कुंभ वर्ष 2022 के बजाए 2021 में पड़ेगा। प्रत्येक शताब्दी में ऐसा एक बार अवश्य होता है।

मंत्रों से उदय होगा आपका भाग्य
व्यक्ति अपना सब कुछ लगाता है, खुद को कामयाब करने केलिए। लेकिन जब उसे सफलता नहीं मिलती तो वह परेशान भी हो जाता है। कहा भी गया है मनुष्य को वही मिलता है, जो उसकेभाग्य में होता है। लाख कोशिश कर ले कोई, लेकिन होता वही है जो उसके नसीब में होता है। ज्योतिष में बताया गया है कि भाग्य देवताओं के आधीन है और देवताओं को अपने अनुकूल करने के उपाय भी हैं। उसके अनुसार, वह अपने सोए भाग्य को जगा सकता है। ज्योतिष द्वारा अपना भाग्य खोलने के भी उपाय हैं।

हमारे जिंदगी में ग्रह मेहमान बनकर आते है और अपना प्रभाव छोड़कर चले जाते हैं। अगर व्यक्ति को पता हो कब-कब कौन-कौन-सा ग्रह आएगा तो वह उससे संबंधित उन ग्रहों के स्वभाव अनुसार उनके मन पसंद की वस्तु इस्तेमाल करेगा और दान देगा तो क्रूर से क्रू र ग्रह भी उस व्यक्ति को कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा। अंतत: वह ग्रह भी प्रसन्न हो कर जाएगा।

आप कोई व्यापार या काम करते हैं तो वहां भी संबंधित व्यक्ति के अनुसार चल कर अपना कार्य मनवा लेते हैं। इसी तरह जो भी मेहमान घर में आए तो उसकी रुचि अनुसार उसको भोजन देंगे, तो वह भी प्रसन्न होकर जाएगा। ज्योतिष में मंत्रों की शक्ति पर विशेष जोर दिया गया है। बताया गया है कि मंत्रों से भाग्य को जगाया जा सकता है।

मंत्र शक्ति द्वारा:- जिस भी जातक की कुंडली में ग्रहों का योग शुभ नहीं है, तो ऐसे जातक का भाग्य, सेहत, बुद्धि ठीक से नहीं रहेगी। अगर ऐसा होता है तो उस जातक की जिंदगी में काफी कठिनाईयां आती है। इस स्थिति से निपटने के लिए जातक को प्रार्थना और मंत्रों का सहारा लेना चाहिए। मंत्रों द्वारा जातक अपनी जिंदगी को काफी हद तक अनुकूल कर सकता है। मंत्रों द्वारा अपने अमंगल में से मंगल को ढूंढा जा सकता है। दुर्भाग्य से सौभाग्य को ढूंढा जा सकता है। जिस भी ग्रह या देवता का मंत्र करना हो, उनकी एक संख्या निर्धारित होती है। उतनी संख्या में मंत्र को जपने, उसका दशांश हवन, दशांश तर्पण, दशांश मार्जन तथा दशांश ब्राह्मïण भोज कराने से मंत्र सफल होता है।

-ज्योतिष साधना से साभार -

सूर्य नमस्कार-सभी रोगों की रामवाण दवा
हमारी दैनिक दिनचर्या में व्यायाम बेहद आवश्यक है | व्यायाम हमारे तन और मन दोनों को स्फूर्ती प्रदान करता है | ऐसा ही एक पूर्ण व्यायाम है सूर्य नमस्कार। योग हमारी संस्कृति की महत्वपूर्ण धरोहर है और एक प्राचीन विद्या भी। योग के माध्यम से तन, मन और आत्मा की शक्तियों का समन्वय कर विशेष लाभ लिया जा सकता है। सूर्य नमस्कार भारतीय योग का का सबसे अहम् हिस्सा है |

वास्तव में सूर्य नमस्कार विभिन्न आसन, मुद्रा और प्राणायाम का समन्वय है | जो हमारे शारीरिक और मानसिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रातः काल सूर्य नमस्कार करने से शरीर के सभी अंगों का पूरा व्यायाम हो जाता है | इसमें सूर्य की ऊर्जा का संचार होता है जिससे तन और मन का शुद्धीकरण होता है तथा शरीर को आवश्यक विटामिन डी की प्राप्ति भी होती है | वैज्ञानिकों ने भी अलग अलग शोधों के माध्यम से सूर्य नमस्कार के लाभों की पुष्टि की है। क्या है सूर्य नमस्कार ? :- प्रातः काल सूर्योदय के वक्त सूर्य नमस्कार तन, मन, वाणी से सूर्य का स्वागत है | सरल उपासना और सौम्य संतुलित व्यायाम सूर्य नमस्कार की प्रमुख विशेषता है | सूर्य नमस्कार सात आसनों का समुच्चय है।

1.प्रार्थना और मुद्रा 2.हस्त उत्तानासन 3.पादहस्तासन 4.अश्व संचालनासन 5.पर्वताआसन 6.आष्टांग नमस्कार 7.भुजंगासन

क्या हैं इसके फायदे ? :- सूर्य नमस्कार 12 स्थितियों से मिलकर बना है जिन्हें करने से बेहद लाभ प्राप्त होते हैं |
व्यायाम की तैयारियों के रूप में एकाग्र एवं शांत अवस्था लाता है |
अमाशय की अतिरिक्त चर्बी को हटाता है और पाचन को सुधारता है तथा भुजाओं और कन्धों की मांसपेशियों का व्यायाम होता है |
पेट तथा अमाशय के दोषों को नष्ट करता है कब्ज़ हटाने में सहायक है | रीढ़ को लचीला बनाता है तथा रक्त संचार में तेज़ी लाता है |
अमाशय के अंगों की मालिश कर कार्यप्रणाली को बेहतर बनाता है | पैरों की मांसपेशियों को शक्ति देता है |
भुजाओं तथा पैरों स्नायुओं की मांसपेशियों को ताकत देता है तथा सीने को विकसित करता है।
अमाशय के अंगों से जामे हुए रक्त को हटाकर नए रक्त का संचार करता है पेट के सभी रोगों के निदान लिए बेहद लाभकारी है |
रीढ़ के स्नायुओं का दबाव सामान्य बनाता है तथा ताजे रक्त का संचार करता है |

सूर्य नमस्कार के द्वारा त्वचा रोग समाप्त हो जाते हैं अथवा इनके होने की संभावना समाप्त हो जाती है। इस अभ्यास से कब्ज आदि उदर रोग समाप्त हो जाते हैं और पाचनतंत्र की क्रियाशीलता में वृद्धि हो जाती है। इस अभ्यास के द्वारा हमारे शरीर की छोटी-बड़ी सभी नस-नाड़ियाँ क्रियाशील हो जाती हैं, इसलिए आलस्य, अतिनिद्रा आदि विकार दूर हो जाते हैं। सूर्य नमस्कार में सभी आसन निहित है । इसके 12 चरण पूर्ण करने पर एक सूर्य नमस्कार पूर्ण होता है । प्रतिदिन लगभग दस सूर्य नमस्कार करने से शरीर में नई स्फूर्ति पैदा होती है और मानसिक शांति भी मिलती है । योग की दृष्टि से सूर्य नमस्कार के नियमित अभ्यास से मानव प्रकृति का सौर पक्ष अर्थात पिंगला नाड़ी जागृत होती और सिर से पैर तक का उज्जीवन होता है । इससे न सिर्फ शरीर पुष्ट होता है, बल्कि शारीरिक व्याधियां भी दूर होती हैं और तेज बढ़ता है । आंखों की ज्योति बढाने के लिए सूर्य नमस्कार रामबाण औषधि है । सूर्य नमस्कार से जीवन दायिनी ऊर्जा प्राप्त होती है, जिससे सर्वोच्च चेतना का विकास होता है । देश का मुस्लिम बहुल राज्य जम्मू-कश्मीर, जहां की एक बड़ी आबादी योग में खूब रुचि ले रही है। सूर्य नमस्कार तन और मन को स्वस्थ करने का एक वैज्ञानिक तरीका है। यह अभ्यास तमाम बीमारियों से बचाता है और इससे शरीर लचीला, सुडौल व चुस्त बनता है। सूर्य भगवान के बारह नामों के कारण सूर्य नमस्कार की बारह अवस्थाएं हैं, जिनका अभ्यास एक क्रम में किया जाता है।

इस क्रम को आप अपनी शक्ति के अनुसार तीन से बारह बार तक दोहरा सकते हैं। पूरे अभ्यास में ध्यान को भगवान सूर्य पर एकाग्र कर मन में यह भाव रखा जाता है कि सूर्य का सीधा प्रकाश मेरे ऊपर पड़ रहा है और मैं प्राणवान, तेजवान, ओजवान व बलवान हो रहा हूं।

सूर्य नमस्कार का अभ्यास उदित होते सूर्य के समय करने से ज्यादा फायदा होता है। इसके लिए सुबह नित्य कर्म से निबटने के बाद खाली पेट पूर्व दिशा की ओर मुख करके खड़े हो जाएं और अभ्यास शुरू करें।

सूर्य नमस्कार में सभी आसनों का सार छिपा है। सूर्य नमस्कार योगासनों में सर्वश्रेष्ठ है। इस योग में लगभग सभी आसनों का समावेश है। सूर्य नमस्कार साधक को सम्पूर्ण लाभ पहुँचाने में समर्थ है। इसके अभ्यास से साधक का शरीर निरोग और स्वस्थ होकर तेजस्वी हो जाता है। सूर्य नमस्कार का अभ्यास बारह स्थितियों में किया जाता है। इसकी भी दो स्थितियाँ होती हैं- प्रथम दाएँ पैर से और द्वितीय बाएँ पैर से।

पहली स्थिति
पहले सावधान की मुद्रा में खड़े हो जाएँ। फिर दोनों हाथों को कंधे के समानांतर उठाते हुए दोनों हथेलियों को ऊपर की ओर ले जाए। हथेलियों के पृष्ठ भाग एक-दूसरे से चिपके रहें। फिर उन्हें उसी स्थिति में सामने की ओर लाएँ। तत्पश्चात नीचे की ओर गोल घुमाते हुए नमस्कार की मुद्रा में खड़े हो जाएँ। सीधे खड़े होकर पैरों को आपस में मिला लें और दोनों हाथों को जोड़कर आंखें बंद कर लें। सांस की गति सामान्य रखें।

दूसरी स्थिति
श्वास भरते हुए दोनों हाथों को कानों से सटाते हुए ऊपर की ओर तानें तथा कमर से पीछे की ओर झुकते हुए भुजाओं और गर्दन को भी पीछे की ओर झुकाएँ। यह अर्धचक्रासन की स्थिति मानी गई है। तीसरी स्थिति
तीसरी स्थिति में श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकालते हुए आगे की ओर झुकें। हाथ गर्दन के साथ, कानों से सटे हुए नीचे जाकर पैरों के दाएँ-बाएँ पृथ्वी का स्पर्श करें। घुटने सीधे रहें। कुछ क्षण इसी स्थिति में रुकें। इस स्थिति को पाद पश्चिमोत्तनासन या पादहस्तासन की स्थिति कहते हैं।

चौथी स्थिति
इसी स्थिति में हथेलियाँ भूमि पर टिकाकर श्वास को भरते हुए बाएँ पैर को पीछे की ओर ले जाएँ। छाती को खींचकर आगे की ओर तानें। दाएं घुटने को मोड़कर सिर को आगे की ओर उठा लें। इस मुद्रा में टाँग तनी हुई सीधी पीछे की ओर और पैर का पंजा खड़ा हुआ रहना चाहिए। इस स्थिति में कुछ समय रुकें।

पांचवीं स्थिति
अब श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकालते दूसरा पांव भी पीछे ले जाएं। दोनों पैरों की एड़ियाँ परस्पर मिली हुई हों। पीछे की ओर शरीर को खिंचाव दें और एड़ियों को पृथ्वी पर मिलाने का प्रयास करें। नितम्बों को अधिक से अधिक ऊपर उठाएँ। गर्दन को नीचे झुकाकर ठोड़ी को कंठ में लगाएँ।

छठी स्थिति
अब सांस छोड़ते हुए दोनों घुटनों, छाती और माथे को जमीन पर लगाएं। यहां नितंब थोड़े ऊपर की ओर उठे रहेंगे। श्वास की गति सामान्य रखें।

सातवीं स्थिति
अब सांस भरते हुए सिर व छाती को ऊपर की ओर उठाएं और कमर व गर्दन को जितना हो सके, पीछे की ओर ले जाएं। इस स्थिति को भुजंगासन की स्थिति कहते हैं।

आठवीं स्थिति
सांस छोड़ते हुए नितंबों को ऊपर की ओर उठाएं और शरीर की आकृति पर्वत के समान बना लें। यहां एडि़यां ज़मीन पर होंगी और सिर को अधिक से अधिक पैरों की ओर ले जाएं। यह स्थिति पाँचवीं स्थिति के समान है। जबकि हम ठोड़ी को कंठ से टिकाते हुए पैरों के पंजों को देखते हैं।

नौवीं स्थिति
अब सांस भरते हुए दायां पैर उठाकर दोनों हाथों के बीच में रख लें व सिर को ऊपर की ओर उठा लें। यह स्थिति चौथी स्थिति के समान है।

दसवीं स्थिति
फिर सांस निकालते हुए दायां पैर उठाकर बाएं पैर के साथ दोनों हाथों के बीच में रख लें और घुटनों को सीधा रखते हुए माथे को घुटनों पर लगाने की कोशिश करें। बिल्कुल तीसरी स्थिति के अनुसार।

ग्यारहवीं स्थिति
सांस भरते हुए अब हाथों को धीरे-धीरे आकाश की ओर उठाएं व कमर को पीछे की ओर थोड़ा मोड़कर रखें। बिल्कुल दूसरी स्थिति के जैसे।

बारहवीं स्थिति
अंत में सांस बाहर निकालते हुए दोनों हाथों को नमस्कार मुद्रा में छाती के बीच में रख लें। पहली स्थिति के जैसे। यह मुद्राएं सूर्य नमस्कार की हैं। इन सभी मुद्राओं को क्रम से करने पर एक सूर्य नमस्कार पूर्ण होता है। हमें प्रतिदिन प्रातःकाल बारह बार सूर्य नमस्कार करने चाहिए। प्रत्येक सूर्य नमस्कार की पहली मुद्रा में सूर्य भगवान् का एक मंत्र उच्चारण करना चाहिए और अगले सूर्य नमस्कार को आरंभ करते हुए दूसरा मंत्र।

बारह सूर्य नमस्कार करने के लिए नीचे सूर्य के बारह मन्त्र दिये गये हैं।
ॐ मित्राय नम:॥१॥
ॐ रवये नम:॥२॥
ॐ सूर्याय नम:॥३॥
ॐ भानवे नम:॥४॥
ॐ खगाय नम:॥५॥
ॐ पूष्णे नम:॥६॥
ॐ हिरण्यगर्भाय नम:॥७॥
ॐ मरीचये नम:॥८॥
ॐ आदित्याय नम:॥९॥
ॐ सवित्रे नम:॥१०॥
ॐ अर्काय नम:॥११॥
ॐ भास्कराय नम:॥१२॥

सावधानी :कमर एवं रीढ़ के दोष वाले साधक न यह योग न करें। सूर्य नमस्कार की तीसरी व पाँचवीं स्थितियाँ सर्वाइकल एवं स्लिप डिस्क वाले रोगियों के लिए वर्जित हैं। कोई गंभीर रोग हो तो योग चिकित्सक की सलाह से ही सूर्य नमस्कार करें।

गणेशजी दूर करते हैं वास्तु दोष
सुन्दर व अच्छा घर बनाना या उसमें रहना हर व्यक्ति की इच्छा होती है। लेकिन थोड़ा सा वास्तु दोष आपको काफी कष्ट दे सकता है। लेकिन वास्तु दोष निवारण के महंगे उपायों को अपनाने से पहले विघ्नहर्ता गजानन के आगे मस्तक जरूर टेक लें। क्योंकि आपके कई वास्तु दोषों का ईलाज गणपति पूजा से ही हो जाता है।

वास्तु पुरुष की प्रार्थना पर ब्रह्मजी ने वास्तुशास्त्र के नियमों की रचना की थी। यह मानव कल्याण के लिए बनाया गया था, इसलिए इनकी अनदेखी करने पर घर के सदस्यों को शारीरिक, मानसिक, आर्थिक हानि भी उठानी पड़ती है।

अत: वास्तु देवता की संतुष्टि के लिए भगवान गणेश जी को पूजना बेहतर लाभ देगा। इनकी आराधना के बिना वास्तुदेवता को संतुष्ट नहीं किया जा सकता। बिना तोड़-फोड़ अगर वास्तु दोष को दूर करना चाहते हैं तो इन्हें आजमाएं।

गणपति जी का वंदन कर वास्तुदोषों को शांत किए जाने में किसी प्रकार का संदेह नहीं होता है। मान्यता यह है कि नियमित गणेश जी की आराधना से वास्तु दोष उत्पन्न होने की संभावना बहुत कम होती है। इससे घर में खुशहाली आती है और तरक्की होती है।

यदि घर के मुख्य द्वार पर एकदंत की प्रतिमा या चित्र लगाया गया हो तो उसके दूसरी तरफ ठीक उसी जगह पर गणेश जी की प्रतिमा इस प्रकार लगाए कि दोनों गणेशजी की पीठ मिली रहे। इस प्रकार से दूसरी प्रतिमा या चित्र लगाने से वास्तु दोषों का शमन होता है। भवन के जिस भाग में वास्तु दोष हो उस स्थान पर घी मिश्रित सिंदूर से स्वास्तिक दीवार पर बनाने से वास्तु दोष का प्रभाव कम होता है।

घर या कार्यस्थल के किसी भी भाग में वक्रतुण्ड की प्रतिमा अथवा चित्र लगाए जा सकते हैं। किंतु प्रतिमा लगाते समय यह ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि किसी भी स्थिति में इनका मुंह दक्षिण दिशा या नैर्ऋ त्य कोण में नहीं हो। इसका विपरीत प्रभाव होता है।

घर में बैठे हुए गणेश जी तथा कार्यस्थल पर खड़े गणपति जी का चित्र लगाना चाहिए, किंतु यह ध्यान रखें कि खड़े गणेश जी के दोनों पैर जमीन का स्पर्श करते हुए हों। इससे कार्य में स्थिरता आने की संभावना रहती है।

भवन के ब्रह्म स्थान अर्थात् केंद्र में, ईशान कोण एवं पूर्व दिशा में सुखकर्ता की मूर्ति अथवा चित्र लगाना शुभ रहता है। किंतु टॉयलेट अथवा ऐसे स्थान पर गणेशजी का चित्र नहीं लगाना चाहिए जहां लोगों को थूकने आदि से रोकना हो। यह गणेशजी के चित्र का अपमान होगा। सुख, शांति, समृद्धि की चाह रखने वालों के लिए घर में सफेद रंग के विनायक की मूर्ति, चित्र लगाना चाहिए।

सर्व मंगल की कामना करने वालों के लिए सिंदूरी रंग के गणपति की आराधना अनुकूल रहती है। इससे शीघ्र फल की प्राप्ति होती है। विघ्नहर्ता की मूर्ति अथवा चित्र में उनके बाएं हाथ की ओर संूड घुमी हुई हो इस बात का ध्यान रखना चाहिए। दाएं हाथ की ओर घुमी हुई सूंड वाले गणेश जी हठी होते हैं तथा उनकी साधना-आराधना कठिन होती है। शास्त्रों में कहा गाया है कि दाएं सूंड वाले गणपति देर से भक्तों पर प्रसन्न होते हैं।

मंगल मूर्ति भगवान को मोदक एवं उनका वाहन मूषक अतिप्रिय है। अत: घर में चित्र लगाते समय ध्यान रखें कि चित्र में मोदक या लड्डू और चूहा अवश्य होना चाहिए। इससे घर में बरकत होती है। इस तरह आप भी बिना तोड़-फोड़ के गणपति पूजन के द्वारा से घर के वास्तुदोष को दूर कर सकते हैं।

आज का विचार - झूठ की थैली में दुनिया के सभी पाप समा सकते हैं। झूठ को छोड़ दो तो तुम्हारे सभी बुरे कर्म खुद ही छूट जाएंगे।

आपकी राय

क्या धार्मिक स्थानों की सफाई की सरकारी व्यवस्था बिल्कुल ठीक है ?
हाँ, बिल्कुल ठीक है।
नहीं, बहुत लापरवाही है।
कह नहीं सकते।